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मालेगांव ब्लास्टः पीड़ितों का दर्द ,17साल बाद भी इन्साफ नहीं मिला,भरोसा टूटा, पर हिम्मत नहीं हारी, suprem court जाएंगे

वक्फ टुडे:
2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में विशेष एनआईए कोर्ट (NIA Court) द्वारा सातों आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले से पीड़ित परिवार गहरे सदमे में हैं। इस विस्फोट में छह लोगों की जान गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। पीड़ितों के परिवारों ने 17 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई में इंसाफ की उम्मीद बनाए रखी थी, लेकिन गुरुवार 31 जुलाई को आए इस फैसले ने उनकी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया। कुछ परिवारों ने इसे स्वीकार कर जिंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश की, तो कुछ अब भी न्याय की आस में हैं। इस मामले में विशेष एनआईए कोर्ट ने सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया।
पीड़ितों का दर्द
इस विस्फोट ने कई परिवारों की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। रेहान शेख, जिनके पिता शेख रफीक (42) की इस विस्फोट में मृत्यु हुई थी, अब मालेगांव-मुंबई रूट पर बस कंडक्टर के रूप में काम करते हैं। रेहान ने बताया कि उनके पिता की मृत्यु के बाद परिवार को रिश्तेदारों ने भी छोड़ दिया था। उनकी मां की बीमारी और दादा-दादी की देखभाल की जिम्मेदारी रेहान पर आ गई। “मेरे पास मुकदमे की पैरवी करने का समय नहीं था। मेरे पिता पान खाने निकले थे, और फिर कभी वापस नहीं आए।”
इसी तरह, 23 वर्षीय इरफान खान, एक ऑटो चालक, की भी इस विस्फोट में मौत हो गई थी। उनके चाचा उस्मान खान, जो एक पावरलूम चलाते हैं, ने कहा कि इरफान की मृत्यु ने परिवार को तोड़ दिया, लेकिन जीविका चलाने की मजबूरी ने उन्हें मुकदमे से ध्यान हटाने पर मजबूर किया। “हमें जीवित रहना था, इसलिए हमने इस दर्द को दबा दिया।”
सबसे बुजुर्ग पीड़ित, 60 वर्षीय हारुन शाह, एक मजदूर थे। उनके पोते आमिन शाह, जो उस समय 14 साल के थे, ने अपने दादा की देखभाल की थी। आमिन ने बताया, “मेरे दादा का पूरा शरीर जल गया था, केवल दाढ़ी वाला हिस्सा बचा था। उनकी देखभाल करते समय मुझे 12वें दिन बीमारी हो गई थी, क्योंकि जले हुए शरीर की गंध असहनीय थी। मैंने उम्मीद की थी कि जिम्मेदार लोगों को सजा मिलेगी।”
विशेष एनआईए कोर्ट के जज ए.के. लाहोटी ने फैसले में कहा कि सरकारी पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि विस्फोट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल पर बम लगाया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि साजिश या बैठकों का कोई सबूत नहीं मिला, और यूएपीए के तहत दी गई मंजूरी में भी खामियां थीं। प्रज्ञा सिंह ठाकुर के स्वामित्व वाली मोटरसाइकिल के बारे में कोर्ट ने कहा कि यह डेढ़ साल पहले से ही फरार आरोपी रामचंद्र कालसंग्रा के पास थी। लेकिन अगर आरोपियों ने यह काम नहीं किया तो फिर रमज़ान के दौरान मालेगांव में ब्लास्ट किसने किया, इस सवाल का संतोषजनक जवाब कोर्ट ने नहीं दिया।
कोर्ट ने सभी सात आरोपियों प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, अजय रहीरकर, समीर कुलकर्णी, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर धर द्विवेदी को बरी कर दिया। कोर्ट ने सरकार को मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये और घायलों को
50,000 रुपये मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया।
पीड़ित निराश  फैसले के बाद पीड़ित परिवारों में गुस्सा और निराशा साफ देखी जा सकती है। निसार बिलाल, जिन्होंने अपने बेटे के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी, ने कहा कि यह फैसला उनके लिए एक और झटका है। उनके वकील शाहिद नदीम ने कहा, “यह मुकदमा सिर्फ सात आरोपियों के खिलाफ नहीं था, बल्कि पीड़ितों और उनके परिवारों को भी एक तरह से कटघरे में खड़ा किया गया। घायल पीड़ितों को मालेगांव से मुंबई तक बार-बार बुलाया गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि एक आरोपी ने इसे ‘सिलेंडर विस्फोट’ करार दिया था।”
हारुन शाह के बेटे हुसैन शाह ने बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, “प्रधानमंत्री नैतिकता की बात करते हैं, लेकिन मुख्य आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सांसद बनाया गया। यह हमारे दर्द का मजाक है।

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