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सुप्रीम कोर्ट का कहा “हम इस नियुक्ति VC , AMU में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं।”

नइमा खातून के अपॉइंटमेंट के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट दखल देने से किया इनकार ।

नइमा खातून के अपॉइंटमेंट के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट दखल देने से किया इनकार ।

दानिश अफगानी
वरिष्ठ पत्रकार

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) ने सोमवार को इतिहास रच दिया। सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर नाइमा खातून की नियुक्ति पर उठी कानूनी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए साफ़ कर दिया कि वह इस विवाद में दखल नहीं देगा।
जस्टिस जे.के. महेश्वरी की पीठ ने कहा कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। याचिकाकर्ताओं कृ प्रो. मुजफ्फर उरूज रब्बानी और प्रो. फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने आरोप लगाया था कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रही और तत्कालीन कार्यवाहक कुलपति प्रो. मोहम्मद गुलरेज़, जो नाइमा खातून के पति भी हैं, ने नाम सुझाने की प्रक्रिया में भाग लिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही यह साफ़ कर चुका था कि नियुक्ति प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हुई।

अब सुप्रीम कोर्ट ने भी यही बात दोहरा दी है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना “हम इस नियुक्ति में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं।”

(आदेश – 8 सितंबर 2025)
दिल्ली :  सुप्रीम फैसले के बाद अब विवाद खत्म हो जाना चाहिए, ऐसे में ज़रूरी है कि एएमयू समुदाय अब एकजुट होकर संस्थापक की जयंती 17 अक्तूबर 25 की तैयारी शुरू कर दे और इस को ऐतिहासिक बनाए।

इस बार क्यों न भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को मुख्य अतिथि बनाया जाए? यह समारोह न सिर्फ सर सैयद की विरासत बल्कि महिला नेतृत्व और सामाजिक समावेशन का प्रतीक भी बनेगा।

बताते चलें कि एएमयू की स्थापना 1920 में सर सैयद अहमद ख़ां के सपनों की तामील के रूप में हुई। 1920 में विश्विद्यालय का दर्जा मिला और 2020 तक जितने भी वाइस चांसलर थे सब पुरुष हुए , 2024 में 104 साल बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को पहली महिला वाइस चांसलर प्रोफेसर नईमा बनी , काबिल ए तारीफ बात ये है कि ये यहीं की छात्रा रहीं यहीं शिक्षिका रहीं यहीं वूमेंस कॉलेज की प्रिंसिपल रहीं और अब वाइस चांसलर हैं, इस लिहाज़ से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को इनसे बेहतर कौन समझ सकता है
प्रो. नाइमा खातून ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ही मनोविज्ञान में पीएचडी की। 30 वर्षों से अधिक का अध्यापन अनुभव।वीमेंस कॉलेज की प्रिंसिपल रहीं। शोध विषय मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी। उनकी नियुक्ति से छात्राओं और महिला नेतृत्व को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
“एएमयू की कमान पहली बार महिला के हाथों में जाना न सिर्फ ऐतिहासिक है बल्कि प्रेरणादायी भी।” चुनौतियाँ और उम्मीदें विश्वविद्यालय की साख को विवादों से ऊपर उठाना। अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना।वैश्विक रैंकिंग में एएमयू की स्थिति मज़बूत करना। महिला शिक्षा और नेतृत्व को नई पहचान दिलाना।
यहां ये समझना जरूरी है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सर सैय्यद की विरासत है सर सैयद ने कहा था “मैं चाहता हूँ कि एक हाथ में कुरान हो और दूसरे हाथ में साइंस, और माथे पर कलिमा तय्यबा का ताज हो।”
17 अक्टूबर को उनकी जयंती आने वाली है। यह दिन सिर्फ़ स्मरण का नहीं बल्कि उनकी दृष्टि को पुनर्जीवित करने का अवसर है। दुनियाभर के अलुम्नी इस दिन को जश्न की तरह मनाते हैं। इस लेख के जरिए पूरी दुनिया के एलुमनाई से मुझे कहना है कि एकता ही असली ताक़त है ।

प्रो. नाइमा खातून की नियुक्ति को लेकर लंबे समय तक चले विवाद अब समाप्त हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ़ कर दिया कि इसमें कोई दोष नहीं है।

ऐसे में ज़रूरी है कि एएमयू समुदाय अब एकजुट होकर संस्थापक की जयंती को ऐतिहासिक बनाए। इस बार क्यों न भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को मुख्य अतिथि बनाया जाए? यह समारोह न सिर्फ सर सैयद की विरासत बल्कि महिला नेतृत्व और सामाजिक समावेशन का प्रतीक भी बनेगा।
प्रो. नाइमा खातून की नियुक्ति एएमयू ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा है। यह संदेश है कि शिक्षा और नेतृत्व में लैंगिक समानता की नई सुबह हो चुकी है। सर सैयद की जयंती इस बार यही संदेश दे सकती है । अब लड़ाई नहीं, मिल-जुलकर आगे बढ़ना ही एएमयू की असली पहचान है

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