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मुतवल्ली/ट्रस्टी RTI एक्ट से बाहर नहीं : नदीम

वक्फ के मुतवली  जवाबदेही से मुक्त नहीं
स्टेट इन्फॉर्मेशन कमीशन का बड़ा फैसला, वक्फ प्रॉपर्टी के इस्तेमाल और इनकम की जानकारी देना ज़रूरी, यह तर्क कि मुतवली  ‘लोक सेवक’ नहीं है, मंज़ूर नहीं।

लखनऊ (वक्फ टुडे  ब्यूरो):  उत्तर प्रदेश के स्टेट इन्फॉर्मेशन कमीशन ने एक बहुत ही अहम और ऐतिहासिक फैसले में वक्फ प्रॉपर्टी के मैनेजमेंट और एडमिनिस्ट्रेशन को लेकर ट्रांसपेरेंसी को ज़रूरी कर दिया है। कमीशन ने साफ किया है कि हालांकि वक्फ प्रॉपर्टी के ट्रस्टी ‘लोक सेवक’ की कैटेगरी में नहीं आते हैं, लेकिन इस आधार पर उन्हें वक्फ प्रॉपर्टी के इस्तेमाल, इनकम और मकसद की जानकारी देने से छूट नहीं दी जा सकती। इस फैसले को वक्फ सिस्टम में जवाबदेही और कानूनी निगरानी को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अब तक वक्फ संपत्तियों के ट्रस्टी इस आधार पर हिसाब देने से बचते रहे हैं कि वे लोक सेवक नहीं हैं, लेकिन ऐसी सोच वक्फ अधिनियम, 1995 की भावना के खिलाफ है। उन्होंने ‘इंकलाब’ को बताया कि हालांकि ट्रस्टी को लोक सेवकों के वर्गीकरण में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन इस आधार पर उन्हें वक्फ संपत्ति के उपयोग, आय और उद्देश्यों का हिसाब देने से छूट नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह फैसला फर्रुखाबाद जिले में एक वक्फ संपत्ति के संबंध में ‘परमिंदर कौर’ के आवेदन पर दिया।

सुनवाई के दौरान, स्टेट इन्फॉर्मेशन कमिश्नर ने ‘उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड’ को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर यह नियम मान लिया जाता है कि ट्रस्टी कोई पब्लिक सर्वेंट नहीं है, इसलिए वक्फ प्रॉपर्टीज़ में जो हो रहा है, उस पर बोर्ड का कोई अधिकार नहीं है, तो यह वक्फ एक्ट, 1995 को बेअसर करने जैसा होगा और वक्फ प्रॉपर्टीज़ कुछ लोगों की पर्सनल एस्टेट बन जाएंगी।
कमिश्नर ने अपने ऑर्डर में साफ किया कि यह बात कि ट्रस्टी कोई पब्लिक ऑफिसर नहीं है, वक्फ प्रॉपर्टी पर मनमानी, गैर-कानूनी कामों को सही नहीं ठहरा सकती या इस पर कोई लीगल सुपरविज़न लागू नहीं किया जा रहा है। यहां सवाल ट्रस्टी का नहीं, बल्कि वक्फ बोर्ड की लीगल ज़िम्मेदारी का है, जो वक्फ प्रॉपर्टीज़ का केयरटेकर और प्रोटेक्टर है।

गौरतलब है कि आवेदक ‘परमिंदर कौर’ ने सूचना के अधिकार के तहत वक्फ बोर्ड से जानकारी मांगी थी कि वक्फ बोर्ड ने वक्फ प्रॉपर्टी में शराब की दुकान खोलने की इजाज़त दी है या नहीं, ट्रस्टी को इस दुकान से हर महीने कितना किराया मिल रहा है और इस कमाई को कैसे रिकॉर्ड किया जा रहा है। जब वक्फ बोर्ड ने जानकारी नहीं दी, तो उन्होंने स्टेट इन्फॉर्मेशन कमीशन का दरवाजा खटखटाया। जिस पर वक्फ बोर्ड ने अपने बचाव में कहा कि वक्फ प्रॉपर्टी को किराए पर देना और किराया वसूलना ट्रस्टी का अधिकार है, कमाई का ब्यौरा समय-समय पर नहीं बल्कि एकमुश्त दिया जाता है, शराब की दुकान का लाइसेंस एक्साइज डिपार्टमेंट जारी करता है और चूंकि ट्रस्टी कोई सरकारी अधिकारी नहीं है, इसलिए जानकारी देना मुमकिन नहीं है।

स्टेट कमिश्नर ने इस बात को खारिज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुतवली वक्फ प्रॉपर्टी का मालिक नहीं है, बल्कि सिर्फ मुतवली और एडमिनिस्ट्रेटर है, इसलिए उसे वक्फ प्रॉपर्टी का मनमाने मकसद से इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं है।

कमिश्नर ने कहा कि मांगी गई जानकारी पूरी तरह से कानूनी थी और दी जा सकती थी, लेकिन इस मामले में जानबूझकर गोलमोल, टालमटोल वाले और गुमराह करने वाले जवाब दिए गए, जो वक्फ बोर्ड की गंभीर कानूनी लापरवाही दिखाता है। कमिश्नर मुहम्मद नदीम ने आदेश दिया कि उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड 15 दिनों के अंदर साफ और असली डॉक्यूमेंट्स के साथ पूरी जानकारी दे। साथ ही, संबंधित ट्रस्टी द्वारा सेक्शन 44 और 46 के तहत जमा किए गए बजट और अकाउंट्स की खास जांच की जाए और इसकी रिपोर्ट कमीशन को दी जाए।

कमिश्नर ने संबंधित पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर पर राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट का जानबूझकर उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए 25,000 रुपये का जुर्माना लगाने का भी आदेश दिया। इसके अलावा, वक्फ बोर्ड के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर/सेक्रेटरी को इस मामले में एडमिनिस्ट्रेटिव नाकामी की जिम्मेदारी लेने और 30 दिनों के अंदर कमीशन को सुधारात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया है।

इस फैसले की एक कॉपी राज्य सरकार, माइनॉरिटी वेलफेयर डिपार्टमेंट और प्रिंसिपल सेक्रेटरी को लागू करने के लिए भेजने का भी निर्देश दिया गया है।

स्टेट इन्फॉर्मेशन कमिश्नर मुहम्मद नदीम

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