दिल्ली के ऐतिहासिक मस्जिदों के रखरखाव की जिम्मेदारी से ASI ने झाड़ा पल्ला; RTI से खुली पोल।
दिल्ली : दिल्ली के ऐतिहासिक मस्जिदों के रखरखाव की जिम्मेदारी से ASI ने झाड़ा पल्ला ।
दिल्ली की ऐतिहासिक मस्जिदों के मैनेजमेंट पर RTI से बड़ा खुलासा हुआ है।
ASI ने कहा कि उसका काम सिर्फ संरक्षण है, नमाज, इमाम या मजहबी इंतजामात की जिम्मेदारी नहीं है। इससे कई ऐतिहासिक मस्जिदों में नमाज पर रोक लगाने और उनके रखरखाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
देश के कई राज्यों में इन दिनों ऐतिहासिक मस्जिदों और मुसलमानों के धार्मिक स्थलों की स्थिति जीर्णशीर्ण है। खासतौर पर केंद्रीय राजधानी दिल्ली में, जिसमें आए दिन नशाखोरी और अश्लीलता की घटनाएं होती हैं. वहीं, सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आई एक अहम जानकारी ने दिल्ली की ऐतिहासिक मस्जिदों के मैनेजमेंट और मजहबी सरगर्मियों से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस रिपोर्ट ने एक बार फिर से ऐतिहासिक मस्जिदों के संरक्षण को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।
RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दिल्ली सर्कल के तहत आने वाली केंद्र सरकार के जरिये संरक्षित ऐतिहासिक मस्जिदों में नमाज, इमामों की नियुक्ति और वुजू जैसी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी ASI नहीं लेता है ।
ASI ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि विभाग का मुख्य दायित्व सिर्फ ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण और उनकी देखभाल करना है।
मजहबी सरगर्मियों के खर्च या व्यवस्थाओं से संबंधित जानकारी उसके पास मौजूद नहीं है। ASI की ओर से दिल्ली सर्कल के तहत संरक्षित मस्जिदों की लिस्ट भी उपलब्ध कराई गई है। इसके साथ ही उन मस्जिदों की अलग लिस्ट भी दी गई है। जहां नियमित रूप से नमाज अदा की जा रही है।
एक और मामले में कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश, बुलडोजर माफिया के खिलाफ मुस्लिम समुदाय का विरोध हालांकि जब RTI में इमाम, मोअज्जिन, वुजू के पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के खर्च से जुड़े सवाल पूछे गए तो विभाग ने इस संबंध में किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार किया और अपनी अनभिज्ञता जताई।
RTI के इस खुलासे से शेख सरताज अहमद मसूदी ने हैरानी का इजहार किया है. उन्होंने कहा कि अगर पाम (पलम) मस्जिद, नीली मस्जिद और सुनहरी मस्जिद में इबादत की इजाजत दी गई है। तो फिर खैर-उल-मनाजिल, बेगमपुरी मस्जिद और जामा मस्जिद फिरोज शाह कोटला समेत अन्य ऐतिहासिक मस्जिदों में नमाज पर प्रतिबंध क्यों जारी है?
जबकि संविधान में हर नागरिक को धार्मिक उपासना का मौलिक अधिकार देता है और किसी स्मारक का दर्जा इस अधिकार में बाधा नहीं बनना चाहिए। वही संरक्षित मस्जिदों में साफ-सफाई और पवित्रता का ठीक से ध्यान नहीं रखा जा रहा है साथ ही कुछ स्थानों पर अतिक्रमण की शिकायतें भी आई हैं।
वैसे ASI के पास इमामों की नियुक्ति या बुनियादी सुविधाओं से संबंधित कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है,तो फिर पूरे मैनेजमेंट के दावों पर सवाल उठते हैं और वक्फ बोर्ड द्वारा मिल्कियत होने के साथ देख भाल नहीं ।
सरताज अहमद मसूदी ने समाजसेवियों और जागरूक नागरिकों से इस अभियान में कानूनी और सार्वजनिक मदद की अपील भी की शेख मसूदी के मुताबिक, इस अभियान के तहत आम लोगों को उन ऐतिहासिक मस्जिदों के बारे में जागरूक किया जाएगा जिन्हें ASI ने ‘नॉन-लिविंग’ यानी गैर-आबाद घोषित किया है ताकि इन ऐतिहासिक इबादतगाहों में फिर से मजहबी सरगर्मियों की बहाली का रास्ता तैयार किया जा सके।
मुफ्ती गफ्फार , सचिव – वक्फ वेलफेयर फोरम ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि ज्यादा तर मस्जिद और मकबरे आबादी की बीच आ गईं है। ग्रीन पार्क की शानदार मस्जिद में एक कंपनी की ऑफिस चलाई जाती है। उम्मीद पोर्टल पे इंद्राज के दौरान कई इलाकों में फोरम की टीम ने पड़ताल और चौंकाने वाले मंजर सामने आए।
लखनऊ में लाल दरबारी यूनिवर्सिटी कैंपस की मस्जिद जर्जर होने के वजह से उसको सील किया गया जबकि उसको मरमत की जिम्मेदारी नहीं , नूर मंजिल की मस्जिद का भी हाल ठीक नहीं ।
